Sunday, October 21, 2012

"यश"स्वी चोपड़ा को समर्पित


अस्सी बरस का यशस्वी जीवन जीकर यश चोपड़ा आज इस संसार से विदा हो गए। मृत्यु अवश्यम्भावी है। अवस्था देखते हुए यह भी नहीं कहा जा सकता कि समय से पहले गुज़र गए। किन्तु यह अवश्य विचित्र लगता है कि सम्पन्नता के महासागर में गोते लगाने वाली शख्सियत डेंगू जैसी बीमारी की चपेट में आ जाता है। ज़िंदगी ऐसी ही अटपटी चीज़ों से भरी पडी होती है। उनको याद करने के बहाने याद करते हैं उनके द्वारा निर्देशित "धर्मपुत्र" को जिसमें धार्मिक कट्टरपन पर, बिना ज्यादा प्रवचन दिए सिर्फ दुराग्रह के बेतुकेपन को रेखांकित करके, बड़ा प्रभावशाली प्रहार किया गया है।

आचार्य चतुरसेन के उपन्यास पर आधारित यह फिल्म यश चोपड़ा की शुरूआती कृतियों में से है। फिल्म को देखकर लगता है कि उस दौर के यश चोपड़ा के सरोकार ही कुछ और थे। हिन्दुत्ववादी गौरव से ओत-प्रोत एक युवक की मनःस्थिति का बढ़िया चित्रण है। पढ़ाई-लिखाई के बीच जोशीले भाषण देने वाले और गीत गाने वाले इस मुख्य पात्र का सारा जोशोखरोश तब काफूर हो जाता है जब उसको यह पता चलता है कि वह एक हिन्दू परिवार गोद लिया गया बच्चा है जिसकी माँ  ने उसे तब जन्म दिया था जब वह कुंवारी थी।
उस ज़माने में अदाकारी पर थियेटर का असर काफी अधिक दिखता था। फिर भी इस फिल्म में भूमिका निभाने वाले सभी कलाकार - अशोक कुमार, मनमोहन कृष्ण, रहमान, माला सिन्हा, शशि कपूर आदि अपनी अपनी भूमिकाओं में खूब जांचते हैं।  बल्कि इस फिल्म को और बिलकुल अलग कथावस्तु को लेकर बनाई गयी "मोहब्बत इसको कहते हैं" देखने के बाद शायद कई लोग मेरी इस राय से सहमत होंगे कि शशि कपूर में भी एंग्री यंग मैन वाली संभावनाएं थी। नियति ने उनको गुस्सैल नौजवानों  का छोटा भाई बनाकर छोड़ दिया।
अपनी थीम के मामले में बेहद प्रचंड इस फिल्म का अत्यधिक कर्णप्रिय  संगीत आश्चर्यचकित करता है। एक ओर  "भूल सकता है भला कौन वो प्यारी आँखें" जैसे सदाबहार मधुर गीत हैं तो दूसरी तरफ "चाहे ये मानो चाहे वो मानो" जैसे दार्शनिक किस्म के गाने। सुनने में कर्णभेदी लगने वाला "ये किसका लहू है कौन मरा" भी अनूठा है, इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता। अपनी जातीयता के गौरव के भार तले दबे युवक का दर्प चूर्ण कर देने वाले सत्य की इससे बेहतर क्या अभिव्यक्ति हो सकती थी?
श्रद्धांजलि और समीक्षा में अंतर होता है। यश चोपड़ा का मूल्यांकन करने के लिए निस्संदेह उनके पूरे कृतित्व पर दृष्टिपात करना होगा और उनकी खूबियों के साथ खामियों का भी ज़िक्र करना होगा। मगर अवसर की मांग देखते हुए फिलहाल हम उनके इस कृतित्व को, जो हमारी राय में उनका सर्वश्रेष्ठ है, याद करते हुए उनकी आत्मा की शान्ति के लिए प्रार्थना करेंगे। 

Sunday, March 25, 2012

कहानी "कहानी" की



बहुतों को सुनने में यह अजीब लगेगा मगर जब मैंने यह फिल्म ख़त्म की तो मुझे बरबस "A  WEDNESDAY " की याद आ गयी. दरअसल दोनों ही फिल्में यह सन्देश देती हुई लगती हैं कि रोजी-रोटी के जुगाड़ में जुटा हुआ आम आदमी एक आतंकवादी से कम साहसी या बुद्धिमान नहीं होता और इस प्रकार की गतिविधियों में लिप्त तत्वों को आगाह करती नज़र आती हैं कि अमन पसंद नागरिकों के जीवन से मत खेलो. 
हालांकि यह भी सच है कि दोनों फिल्मों के बीच की समानता यहीं तक है. जहां "A  WEDNESDAY " में आतंकवाद का मुद्दा केंद्र में था वहीं कहानी में यह नेपथ्य में है. इसके अलावा अन्य भिन्नताएं तो हैं ही, मसलन वो एक नायक-प्रधान फिल्म थी और यह नायिका-प्रधान, वह डेढ़ घंटे लम्बी थी और यह पूरे ढाई घंटे की है, उसमें मुख्य पात्र की वास्तविक पहचान पर पर्दा पडा ही रह जाता है इसमें बड़े रोचक ढंग से फिल्म के अंत में उजागर होता है, आदि.
बहरहाल फिल्म बेहतरीन है और कई कारणों से देखने योग्य है.  सबसे प्रमुख कारण, हमारी नज़र में, यह है कि एक बार जब आप फिल्म देखना शुरू कर देते हैं तो ख़त्म होने तक आपको घड़ी देखने की ज़रुरत नहीं पड़ेगी. यह एक ऐसी सस्पेंस फिल्म है जिसका सस्पेंस सिर्फ क्लाइमेक्स में ही नहीं है हर फ्रेम ही आपको एक नया सस्पेंस पेश करता मिलेगा. फिल्म बेहद तेज़ गति से चलती है, बगैर किसी औसत फ़िल्मी मसाले के और लगातार दर्शक की दिलचस्पी बनाए रखती है जो कि आइटम नंबर और तमाम ऐसे चोंचलों के ज़माने में एक बड़ी बात है. इसके अलावा इसका विचित्र स्टार कास्ट भी ज़िक्र करने लायक है. फिल्म के ज़्यादातर कलाकार हिन्दी फिल्मों में पहले नहीं देखे गए हैं यद्यपि ऐसा सुनने में आता है कि उनमें से कई बँगला सिनेमा के स्थापित कलाकार है. इन कलाकारों की मौजूदगी और बम्बइया पैंतरों से मुक्त अदाकारी फिल्म को और ज्यादा प्रभावशाली बनाते हैं. किरदार भी बड़े दिलचस्प गढ़े गए हैं. नायिका अपने को एनआरआई बताती है और एकाएक गुमशुदा हो गए अपने पति को खोजती हुई विदेश से कलकत्ता पहुँच जाती है. यहाँ उसका साबका एक-से-बढ़कर-एक नमूनों से होती है जिनमें से ज़्यादातर तो पुलिस वाले ही हैं. पुलिसिया लोगों को न तो फरिश्तों की तरह दिखाया गया है न हैवानों की तरह. हाँ, हास्यास्पद रूप से काहिल ज़रूर दिखाया गया है जो कि वास्तविकता के करीब लगता है. इसके अलावा भी भांति-भांति के किरदार गढ़े गए हैं. अधेड़ उम्र का ऐसा भाड़े का हत्यारा जो दिन भर गले में दफ्तरी बाबू की तरह बैग लटकाए बीमा कंपनी में नौकरी बजाता है किसी ने पहले कहाँ देखा होगा?
तारीफ़ इस बात की भी करनी होगी कि फिल्म में कलकत्ता शहर को बड़े ही जीवंत रूप में दर्शाया गया है. इसके कैमरामैन अवश्य ही असाधारण प्रतिभा के धनी हैं जो कि दर्शक को इस एहसास से भर देते हैं कि वह स्वयं ही इस अजीबोगरीब महानगर की तंग गलियों, खँडहर होती इमारतों और दुर्गा पूजा के जश्न में डूबी भीड़ से खचाखच भरी सडकों से गुज़र रहा है.
और आखिर में, किसी भी फिल्म में जब विद्या बालन होती हैं तो वो फिल्म देखने की अपने आप में एक बहुत बड़ी वजह हो जाती है. वो एक ऐसी अभिनेत्री हैं जिनके लिए अब अलफ़ाज़ कम पड़ने लगे हैं. कोइ ऐसा भाव नहीं लगता जिसको अभिव्यक्त करना उनके लिए मुश्किल हो और एक भाव से दूसरे भाव तक का सफ़र भी वे बिजली की रफ़्तार से तय करती हैं. जब वे चलती हैं तो उनकी चाल-ढाल में एक गर्भवती स्त्री का कष्ट झलकता है. उनके चेहरे के भावों से प्रसंग के अनुसार हैरानी, झल्लाहट, अनुनय, हताशा, वात्सल्य, सब कुछ झलकता जाता है और संवाद अदायगी तो हैरत अंगेज़ होती है. मूल रूप से अहिन्दी भाषी होते हुए भी उच्चारण की स्पष्टता पेशेवर उद्घोषकों को लजा देगी. एक और रहस्यमय गुण है उनमें. रामायण में बाली के बारे में कहा गया है कि उसके सामने वाले का आधा बल निकल कर उसी में चला आता था. विद्या बालन का भी कुछ ऐसा ही मामला लगता है. कोई कितना भी बढ़िया अदाकार हो, उनकी मौजूदगी में ही फीका लगने लगता है! हाल में कहीं पढ़ा कि उनको "लेडी आमिर खान" कहा गया है तो ऐसा लगा कि यह तो आमिर खान के लिए तारीफ़ की बात है. "परिणीता" से लेकर "कहानी" तक के सफ़र को देखते हुए तो बरबस उनके लिए यह विचार मन में आ जाता है - न भूतो न भविष्यति.
ज़ाहिर है इतनी सारी वजहों के बावजूद अगर आपने "कहानी" नहीं देखी है तो आप एक बहुमूल्य अनुभव से वंचित हैं. 

Thursday, March 22, 2012

Bye Bye Blackbird

Bye, Bye, Blackbird is one of the lesser-known works of Anita Desai, an author of Indian origin whose works have been impressive enough to have made it to the Booker shortlist thrice but who herself has never been lucky enough to hit the bull's eye unlike her daughter Kiran who bagged the coveted award for her debut novel - The Inheritance of Loss.
It is a novella set against the backdrop of Indian expatriates living in London of the 1970s, much before UK was relegated to the status of "a third-rate power" as described by a former Indian PM. The story and revolves around three characters - (a) Dev, an irritable, cynical and ambitious young man who lands in the city to pursue higher studies, and make it big back home armed with a foreign degree, (b) His host Adit, a fellow Bengali living in England for quite some time who makes every attempt to convince himself of being content with his new life and his adopted land and (c) Adit's English wife Sarah, a quiet but resilient woman whose portrayal may disappoint those who expect a certain type of flamboyant vivacity from blondes.
Dev arrives in London torn between his desire for a foreign degree and his loathing towards the various types of scorn that he is subjected to because of his colour, ranging from sophisticated condescension to outright crude abuse. His annoyance becomes more acute by the affected nonchalance of Adit, who spares no opportunity to scoff at his guest's distaste for the eccentricities of the English people and treats him with contempt when he gets scandalized upon seeing public displays of affection, a taboo in his home country. However, a hidden stream of kindness and love for his compatriot prevents Adit from showing the door to the young guest who never appears serious about pursuing a career.
Sarah comes across as a reticent and even timid character, never fully at ease with her own life but always at pains to make those around her comfortable. She feels apologetic whenever Dev fumes at a racial slur even though her husband, himself a non-white, tries to gloss it over going to the extent of ridiculing his friend and accusing him of overreacting.
The Englishwoman nurses a hidden fascination for India, though not in the exotic sense, where she had gone with Adit before their marriage, only to come back on account of her would-be-husband's dissatisfaction with the way things were back home. She speaks very little, but whenever she does she shows an uncanny appreciation of the liveliness that ran through the chaos of the erstwhile British colony.
The trio get on with life and through their encounters with diverse situations and characters of not much consequence, the reader gets to delve deeper into their respective psyches.
The story takes a major turn when the trio visit a village close to Winchester where Adit's in-laws live a secluded retired life. Strangely, Adit is excited about the tour while Sarah is not and when she finally gives in, she does so making her reluctance obvious. Dev accompanies them in a state of weary indifference towards the land where he has begun to feel disoriented.
They travel with two friends of Adit, Indians of course. One of them is a Punjabi accompanied by his Punjabi wife Mala. The other is a Bengali like Adit and Dev, who has not been able  to convince his English wife Bella to come along.
After a day of boisterous frolic, the friends depart leaving Adit, Sarah and Dev amidst the placid surroundings where they are to spend the rest of the week.
Nothing overtly dramatic takes place during the following six days though both Adit and Dev appear completely changed people by the time they return home, much to the bafflement of Sarah.
Dev, spending nearly a week amidst the serene and exquisite countryside, is struck by the simplicity of the local peasantry which makes him realize that there is more to England than its arrogance. He also slowly realizes that he can not live off his father's money and his friends' generosity for long and starts a job hunt and the bitter experiences that come along help him mature, dilute his sardonicism and infuse a bit of tenderness and compassion into his callous self .
Adit, who had planned the tour with much warmth, ends up feeling out of place at his rather cold in-laws'.  He finds himself unable to come to terms with the incompatibility he felt with them even though not with his own wife. Back in London, a nasty quarrel between his Bengali friend Samar and his English wife Bella makes him ponder, after an unsuccessful attempt at laughing the episode off, - "why does everything have to come to this - that we're Indians and you're English and we're living in your country and therefore we've all got to behave in a special way, different from normal people. He sinks into  depression and starts suffering from bouts of nostalgia, taking his wife to shabby Indian restaurants, listening to Indian music etc. His state of mind begins to reflect upon his professional life affecting the reputation he had earned by virtue of his efficiency. In between comes the news of an Indo-Pak war and Adit and his friends indulge in quite a bit of long-distance patriotism. Finally, one day he declares to his wife that he wants to go back to India and asks Sarah, now expecting their first child, whether she would like to accompany. A committed wife that she is, Sarah starts packing up, spurns a lucrative job offer and withstands Adit's mood swings while  enduring own physical and emotional travails with fortitude.
The novella ends at the Waterloo railway station, from where Adit and Sarah embark upon their onward journey. Dev, whom Adit has helped get a decent job in the firm from which he has resigned and whom Sarah has convinced to rent the same Clapham flat in which the couple used to live, has come to see them off.
"Dev stood silent, watching, for the most complex feelings of all tumbled and tossed inside him, clamouring for attention, for resolution. If plans and prophesies had any strength in them at all, it would have been he steaming out on the train to catch the boat back to India. This was what he had planned and, for some time, sincerely believed. It was Adit who had found himself a pleasant groove to fit into, with his English wife and the education that had, he so repeatedly told them, brought him up to love and understand England".
"Why, then was it Adit who was leaving and he stayed on? What made them exchange the garments of visitor and exile", Dev asks himself.
The author says in the next paragraph  - "There had been time enough in which to think of replies, sort them out and suitably dress them in conviction. But, somehow, both he and Adit had avoided the ultimate question and they parted in ignorance of the answer".

What follows is a page-long perspicacious analysis of the seemingly improbable changes that both Adit and Dev underwent. The  philosophical undertone gives a vague hint of the author's possible,  belief in the doctrine of Karma as expounded in Vedanta as well as Buddhism.
It would be an injustice to the author to give away her beautiful and concise exposition in a run-of-the-mill blog post. Please do read the small book if you find the plot interesting.

Sunday, October 2, 2011

एक ही रास्ता - जिसे पसंद करने के अलावा कोइ रास्ता नहीं


आज हम अपने दोस्तों से बीते दौर के खजाने के एक और नगीने का लुत्फ़ उठाने का आग्रह करेंगे. इस अनमोल रत्न का नाम है "एक ही रास्ता". हो सकता है कुछ लोगों ने देखी भी हो. किसी कारणवश समीक्षकों द्वारा इस फिल्म का उल्लेख कम ही देखते हैं जबकि कथावस्तु के लिहाज़ से यह एक (सही मायने में) "बोल्ड" फिल्म थी. 
अपने ज़माने के धाकड़ पटकथा लेखक पंडित मुखराम शर्मा की स्क्रिप्ट इस फिल्म की रीढ़ है और मुख्य भूमिकाएं निभाईं हैं अशोक कुमार, सुनील दत्त, मीना कुमारी और उस दौर की मशहूर बाल कलाकार डेजी ईरानी ने. कहानी शुरू होती है एक सीमेंट कंपनी में काम करने वाले अमर, उसकी कलाकार पत्नी मालती और उन दोनों के इकलौते बेटे राजा की हंसती-खेलती ज़िंदगी से. जो चीज़ इस फिल्म में सबसे पहले आपका ध्यान आकृष्ट करती है वह है इन तीनो पात्रों के पारिवारिक जीवन का अति सजीव चित्रण. इसे युवा सुनील दत्त और मीना कुमारी की अदाकारी और डेजी ईरानी की गुदगुदाती मौजूदगी का जादू कहें या बी आर चोपड़ा के निर्देशन का कमाल, इस तफसील को समीक्षकों के लिए छोड़ देते हैं. इतना ज़रूर है कि यदि आप इस फिल्म को देखें तो इन तीन पात्रों और इनके अलमस्त पारिवारिक जीवन का हिस्सा स्वयं को समझने से रोक नहीं पायेंगे. 
यह सुन्दर पारिवारिक जीवन अमर की कंपनी के मालिक प्रकाश बाबू (अशोक कुमार) को भी अपने चुम्बकीय आकर्षण में बाँध लेता है. प्रकाश बाबू बड़ी जायदाद के इकलौते वारिस हैं और अविवाहित हैं. शौक़ीन मिजाज़ हैं लेकिन ध्यान रखिये, उनके चरित्र में किसी प्रकार का लचरपन आपको नहीं दिखेगा. अपना घर बसाने को लेकर उहापोह की स्थिति में रहते हैं प्रकाश बाबू. अमर-मालती-राजा की गृहस्थी की जिंदादिल सादगी से जहां उनका दिल मसोस उठता है कि उनका अपना भी परिवार होता. लेकिन तरह-तरह के लोगों के साथ उठने-बैठने वाले प्रकाश बाबू पारिवारिक जीवन के इससे बिलकुल विपरीत उदाहरण याद करके घबराते भी हैं. 
बहरहाल, उनका बिजनेस अमर के चौकस प्रबंधन में फलता-फूलता रहता है और अमर भी अपनी ज़िंदगी में खुश है. मगर जैसा कि हर जगह होता है, प्रकाश बाबू के यहाँ अमानत में खयानत करने वाले लोग भी हैं. कंपनी के सीमेंट की कालाबाजारी करते हुए एक ट्रक ड्राइवर को अमर रंगे हाथों पकड़ लेता है और उसको जेल हो जाती है तथा उसका साथ देने वाले बेईमान मगर भीरु किस्म के मुनीम (जीवन) की नौकरी चली जाती है. सारी कार्रवाई अमर के द्वारा लिए गए फैसलों पर ही होती है. मुनीम सीधा प्रकाश बाबू के हाथ-पाँव जोड़कर नौकरी बचाने की कोशिश करता है मगर कोइ फायदा नहीं. कंपनी के मालिक अपने विश्वासी मैनेजर के हाथों अपना बिजनेस सौंपकर मस्त रहते हैं और मुनीम से बात करने से इनकार कर देते हैं. कुटिल मुनीम अपना दुखड़ा अपने पुराने मित्र ट्रक ड्राइवर के पास जाकर रोता है जो कि उसको इस बात का इशारा कर देता है कि जेल से बाहर निकलते ही वह अमर से बदला लेगा.
अमर से आमना-सामना होता भी है. मगर अमर भी हृष्ट-पुष्ट नौजवान ठहरा. ट्रक ड्राइवर की कुटाई होती है और वो अपने दोस्त मुनीम के साथ, जो कि अब फुटपाथ पर खोमचा लगाने लगा है, अगला वार करने की योजना बनाने लगता है. इधर अमर अपने बेटे के जन्मदिन की तैयारियों में व्यस्त हो जाता है. तमाम लोगों के साथ प्रकाश बाबू भी आमंत्रित हैं. वे चुलबुले राजा पर विशेष स्नेह रखते हैं. जन्मदिन के रोज़ घर में बच्चों का गाना-बजाना चलता रहता है और इसी बीच अमर को याद आता है कि कुछ ज़रूरी चीज़ें लानी बाकी हैं. वो घर से निकलता है अपनी सायकिल पर और उधर गेहुएं सांप की तरह घात लगाए ट्रक ड्राइवर तैयार रहता है. वो अपना ट्रक अमर के ऊपर चढ़ा देता है और उत्सव वाला घर मातमी बन जाता है. 
मालती और अमर दोनों अनाथाश्रम में पले-बढे थे एक दूसरे के साथी बनने से पहले. अपने वैधव्य से स्तब्ध मालती के लिए एक ओर अपना लंबा जीवन है दूसरी तरफ उसका बेटा राजा जो "पिता जी" की रट लगाए रहता है और जिसको हकीकत बताना भी मुश्किल है. संवेदनशील ह्रदय वाले प्रकाश बाबू इस बात को भूल नहीं पाते हैं कि अमर की जान उनके बिजनेस को सुचारू रूप से चलाने के क्रम में ही गयी थी. वे राजा को समझाते हैं कि "तुम्हारे पिता जी बीमार हैं और अस्पताल में हैं". इसी के साथ एकाकी जीवन जीने को अभिशप्त मालती को भी वे अपनी कला में संबल ढूँढने के लिए प्रेरित करते हैं और उसे एक डांसिंग स्कूल खोलने में मदद भी करते हैं. मगर समाज इन भावनाओं की शुद्धता को कहाँ समझ सकता था? कुटिल मुनीम के नेत्रित्व में सारा मोहल्ला, जिसने मालती की उसके दुर्दिन कभी सुध नहीं ली थी, उसको दुश्चरित्र घोषित करने और मोहल्ले से बाहर निकालने पर आमादा हो जाता है. प्रकाश बाबू यहाँ भी उसका बचाव करते हैं और सबके सामने उससे विवाह करने की घोषणा कर डालते हैं और पूरे साहस के साथ उस पर अमल भी करते हैं.
यहाँ से फिल्म एक अलग तेवर अख्तियार कर लेती है. प्रकाश बाबू की करुणा और मालती की कृतज्ञता के बीच आ खडी होती है इस सारे प्रकरण को समझ पाने में अक्षम बच्चे राजा का गुस्सा. जिन प्रकाश बाबू से वह हमेशा हिला-मिला रहता था, उनसे वह चिढने लगता है. जब मालती उसको समझाती है कि वो प्रकाश बाबू को "पिता जी" कहकर संबोधित किया करे तो वह भड़क उठता है. स्थिति और विकट हो जाती है जब प्रकाश-मालती के विवाह के फलस्वरूप एक बच्चे का जन्म होता है. एक ओर तनावग्रस्त मालती कमज़ोर होती जा रही है तो दूसरी तरफ घर की बेलगाम ज़बान वाली नौकरानी और अब उसके स्कूल के पास खोमचा लगाने वाले दुष्ट मुनीम के प्रलाप उसके सरल मन को विक्षेप से भर देते हैं. इसके बाद एक-के-बाद एक हरकतें होती हैं राजा के हाथों जिसके लिए उसकी माँ तक उससे रुष्ट हो जाती है मगर अद्भुत धीरता और औदात्य का परिचय देते हुए प्रकाश बाबू अंततोगत्वा बच्चे का दिल जीतने में सफल रहते हैं. 
जिन लोगों ने फिल्म न देखी हो उन्हें निम्न कारणों से अवश्य देखनी चाहिए -
१. बेजोड़ कहानी और पटकथा जो आपको कभी उकताने नहीं देती 
२. अमर, मालती और राजा के पारिवारिक जीवन का अति सुन्दर और सजीव चित्रण जो कि जितनी देर तक स्क्रीन पर रहता है आपके होठों से मुस्कराहट को दूर नहीं जाने देता 
३. प्रकाश बाबू का अद्भुत, शौक़ीन मगर फिर भी कुछ हद तक फकीराना,  चरित्र.
४. लच्छू महाराज की कोरियोग्राफी जो बाल कलाकारों और एक्स्ट्राज तक की भंगिमाओं में दीखती हैं.
कमियाँ हर फिल्म में होती हैं. ढूँढने पर इसमें भी मिल जायेंगी. लेकिन यदि आपने इस फिल्म को नहीं देखा है तो आप स्वयं को एक सुन्दर अनुभव से वंचित रखे हुए हैं. 

Wednesday, September 21, 2011

कानून: हिंदी सिनेमा का पहला नाच-गाना मुक्त प्रयोग





अभी के दौर में लुप्तप्राय हो चुकी कला फिल्मों और व्यावसायिक सिनेमा के बीच में क्या फर्क है? सिनेमा के अध्येता इस पर बेहतर व्याख्यान दे सकते हैं. मगर एक सामान्य दर्शक से अगर पूछा जाय तो वह तुरंत कह बैठेगा - कला फिल्मों में नाच-गाना नहीं होता था. बात काफी हद तक सही भी है. आजकल बहुत सी ऐसी फिल्में बनने लगी हैं जिनको लोग कला और व्यावसायिक फिल्मों के बीच की खाई को पाटने का श्रेय देते हैं. इनमें से कई फिल्में ऐसी हैं जो विशुद्ध व्यावसायिक मनोरंजन देती हैं लेकिन नाच-गाने के फ़ॉर्मूले से मुक्त होती हैं. इस पृष्ठभूमि में, आइये एक नज़र डालें इस प्रकार के पहले प्रयोग की, जो कि आधी शताब्दी पहले किया जा चुका था और जिसे लोगों ने सराहा भी था.
बात हो रही है वर्ष १९६० में प्रदर्शित हुई बी आर चोपड़ा द्वारा निर्देशित "क़ानून" की. बी आर चोपड़ा व्यावसायिक ताने-बाने में रहकर "धर्मपुत्र" और "धुल का फूल" जैसी फिल्में भी बना चुके हैं और "वक्त" जैसी विशुद्ध मसाला मल्टीस्टार फिल्म भी पेश कर चुके हैं. सरसरी तौर पर देखें तो ऐसा नहीं लगेगा कि "क़ानून" में वे कोइ विशेष प्रयोग करने बैठे थे. फिल्म एक किस्म की क्राइम थ्रिलर है. इसमें सस्पेंस ज़बरदस्त है. अशोक कुमार, नंदा और राजेन्द्र कुमार जैसे अपने दौर के चमकते सितारों ने अभिनय किया है. यानी कि मनोरंजन का सारा मसाला मौजूद. मगर फिल्म ख़त्म हो जाने के बाद दर्शक को इस बात का एहसास हो पाता है कि ढाई घंटे के दौरान एक गाना नहीं बजा. और यही इस फिल्म की ताकत है. कहना गलत न होगा कि उस दौर में यह फिल्म अपने समय से आगे चल चुकी थी. 
फिल्म बहुत दिलचस्प है, यद्यपि दोषरहित नहीं है. एक ह्त्या के मुक़दमे के इर्द-गिर्द कथा चलती है और हत्यारा कौन है यह जब सामने आता है तो वह नाटकीय और हास्यास्पद लगता है. मगर यह अवश्य है कि ऐसा तब लगता है जब आप फिल्म ख़त्म हो जाने के बाद उस पर सोचने बैठते हैं. देखते वक्त फिल्म दर्शक को अपने सम्मोहन पाश में लेने में पूर्णतया सफल रहती है. 
फिल्म की कहानी का खुलासा करना मुनासिब नहीं लगता क्योंकि मकसद लोगों को इसे देखने को प्रेरित करना है. कहानी बताने से सस्पेंस ख़त्म हो जाएगा और उससे फिल्म बेमजा भले न हो जाय थोड़ी कम मजेदार ज़रूर  लग सकती है. मगर कुछेक बातें बतलाते हैं जो कि आपकी दिलचस्पी को जगाएगी.
यह शायद पहली हिन्दी फिल्म है जिसमें सज़ा-ए-मौत का बड़े दमदार ढंग से विरोध किया गया है. कोइ विशेष प्रवचन नहीं दिया गया है मानवाधिकार वगैरह को लेकर. मुख्यतया इसमें इस बात पर बल दिया गया है कि अभियोजन की प्रक्रिया में हमेशा त्रुटियाँ रह जा सकती हैं. साक्ष्य इत्यादि तमाम ईमानदारी और चौकसी बरतने के बावजूद भ्रामक हो सकते हैं. ऐसे में इस बात की दुर्भाग्यपूर्ण संभावना बनी रहती है कि किसी व्यक्ति को ऐसे अपराध के लिए दंड दे दिया जाय जो उसने न किया हो. ऐसे में अगर मौत की सज़ा दे दी जाती है तो भूल सुधार की भी क्या गुंजाइश रह जाती है?
मगर यह सब पढने में कभी उतना रोचक नहीं लग सकता है जितना देखने में लगेगा. ब्लैक एंड व्हाईट दौर की फिल्मों से जिन्हें परहेज़ न हो वे अवश्य देखें. 

Monday, June 6, 2011

36 चौरंगी लेन: शातिर जवानी के हाथों छले गए मासूम बुढापे की दर्द भरी दास्ताँ




















यह साल 2011 भारतीय फिल्मों के मामले में पिछले साल से कितना अलग साबित हो रहा है. पिछले साल ऐसी ढेरों फिल्में आयीं थी जिनका इंतज़ार बेसब्री से किया जा रहा था. उनमें कुछ अपेक्षाओं पर खरी उतरीं तो कुछ ने निराश किया. कुछ उम्मीद से भी बेहतर साबित हुईं. इस साल न जाने क्या हुआ है कि किसी फिल्म को लेकर मन उत्सुक नहीं हो पा रहा है. ऐसे में अतीत के खजाने में छिपे रत्नों की तलाश स्वाभाविक थी. ऐसा ही नायाब एक रत्न हाथ लगा जिसका नाम है 36 चौरंगी लेन.
जो लोग इस फिल्म से वाकिफ नहीं हैं उनको बताते चलें कि यह दरअसल एक अंग्रेज़ी फिल्म है. इसके पात्रों ने अपने सारे संवाद, इक्का-दुक्का प्रसंगों को छोड़कर, अंग्रेज़ी में ही बोले हैं. मगर इससे हिंदी सिने-प्रेमियों को निराश होने की ज़रुरत नहीं है. फिल्म के संवाद बेहद सरल भाषा में हैं जिनको औसत दर्शक भी आसानी से समझ सकता है. सबसे दिलचस्प बात यह है कि सभी कलाकारों ने, ब्रिटिश मूल की जेनिफर कपूर को छोड़कर, अपने संवाद खालिस देसी अंदाज़ में बोले हैं जिसके चलते सबटाइटिल की ज़रुरत नहीं रह जाती है. मगर यह भी समझ लेना आवश्यक है कि जेनिफर, अपने अंग्रेज़ी लहजे के साथ, इस फिल्म की रीढ़ हैं और उनको देखने के बाद अपने यहाँ की सतही अभिनेत्रियों को देखकर सर धुनने को जी करता है.   
यह कहानी है एक अधेड़ एंग्लो-इन्डियन महिला वायलेट स्टोनेहम की, जो कलकत्ता के एक अंग्रेज़ी माध्यम के स्कूल में पढ़ाती हैं और किराए के मकान में नितांत एकाकी जीवन जीने को अभिशप्त हैं. कोमल ह्रदय और संकोची स्वभाव वाली इस महिला का कोई नहीं है इस दुनिया में, सिवाय एक अदद पालतू बिल्ली और वृद्धाश्रम में अपनी आख़िरी साँसे गिन रहे बीमार भाई के. बरसों से एक ही स्कूल में विद्यार्थियों को शेक्सपियर से परिचित करवाने वाली इस महिला के जीवन में एक नाटकीय मोड़ तब आता है जब वो अपनी एक पुरानी स्टूडेंट नंदिता से टकरा जाती हैं. अकेलेपन, प्रियजनों से वियोग और डरावने सपनों के रूप में इन सबकी गड्ड-मड्ड पुनरावृत्तियों से आजिज स्टोनेहम नंदिता को बरसों बाद देखकर बहुत खुश होती हैं और बहुत मनुहार के साथ उसको अपने घर कॉफ़ी पीने के लिए बुलाती हैं. नंदिता उनके घर अपने मित्र समरेश के साथ पहुँचती है. गुलछर्रे उड़ाने के लिए उपयुक्त अड्डा तलाश रहा यह युवा जोड़ा इस सहृदय अधेड़ महिला और दिन के अधिकाँश समय सुनसान रहने वाले उसके मकान को एक स्वर्णिम अवसर की तरह देखता है. 
स्टोनेहम के भावुक साहित्यिक मन को ताड़ते हुए समरेश का परिचय एक उदीयमान लेखक के रूप में स्टोनेहम से करवाया जाता है और साथ ही इस बात का दुखड़ा रोया जाता है कि कैसे शांत वातावरण के अभाव में यह प्रतिभावान (?) युवक अपने रचनाकर्म में जी-जान से नहीं जुट पा रहा है. दांव सही बैठता है और स्टोनेहम बड़े अनुग्रह के साथ समरेश को राजी कर लेती है कि दिन भर जब वे स्वयं स्कूल में व्यस्त रहती हैं उस समय वो अपनी साहित्य-साधना हेतु उनके घर के सन्नाटे का उपभोग कर लिया करे. अगले दिन से समरेश उनके घर नियम से पहुँचने लगता है और उसके चाय इत्यादि का प्रबंध करने के बहाने से नंदिता भी. साहित्य-साधना तो खैर क्या होनी थी उनकी मौज-मस्ती खूब होती है. विडम्बना यह है कि इस पूरे प्रकरण में अधेड़ महिला स्वयं को ही उपकृत समझती है कि इन दोनों ने उसके वीरान जीवन में कुछ रौनक ला दी. 
बहरहाल, समरेश को नौकरी मिल जाती है और वो नंदिता से शादी कर लेता है. भावुकता में किये गए अपने वादे को पूरी संजीदगी से निभाते हुए स्टोनेहम अपना पुराना ग्रामोफोन युवा दंपत्ति को तोहफे में दे देती है. बाद में अपने घर पर पड़े हुए पुराने संग्रहणीय रेकॉर्ड्स भी खुद उनके घर जाकर दे आती है. क्रिसमस नज़दीक आती है तो उसे याद आने लगता है कि कैसे समरेश ने एक बार खिलंदडपने में उसके हाथ का बना केक खाने की फरमाईश कर दी थी. आह्लादित स्टोनेहम नंदिता को फोन मिलाती है और उनको दावत का न्योता देती है. युवा दंपत्ति उहापोह में है. वो साफ़ इनकार करने की धृष्टता नहीं करना चाहता लेकिन उस बुढिया के लिए अपना वक्त भी बर्बाद करने को तैयार नहीं है, ख़ास तौर से तब जब वो इनके किसी काम की नहीं रह गयी है. अतएव उससे बहाना बना दिया जाता है कि क्रिसमस के दिन वे दोनों कलकत्ता से बाहर रहेंगे. उदास स्टोनेहम, जो इस बीच अपने भाई की मृत्यु के बाद से बिलकुल अकेली रह गयी है, दुखी मन से और आदत से मजबूर होकर क्रिसमस की तैयारी करती है. उसने फैसला कर लिया है कि नंदिता और समरेश भले ही उस दिन कलकत्ता में न हों, वो अपने हाथ से तैयार किया हुआ केक उनके घर पहुंचा आयेगी ताकि जब वो वापस घर लौटें तो उसका आनंद उठा पाएं. 
क्रिसमस के खुमार में डूबे माहौल के बीच वो एक टैक्सी खोजती है और उसमें बैठकर समरेश-नंदिता के घर की तरफ निकल पड़ती है. वहां पहुंचकर सबसे पहले तो वो उनके घर के बाहर गाड़ियों की भरमार देखकर बौखला जाती है. जब वो उनके कांच के फाटक के नज़दीक पहुँचती है तो उसे यह देखकर और भी आश्चर्य होता है कि अन्दर जोर-शोर से दावत चल रही है. सबसे ज्यादा धक्का उसे तब पहुंचता है जब वह देखती है कि समरेश और नंदिता बड़े लुत्फ़ के साथ मेजबानी कर रहे हैं और उसी के द्वारा तोहफे में दिए गए ग्रामोफोन और रेकॉर्ड्स की मेहमानों द्वारा की जा रही सराहना पर इतरा रहे हैं. हताश स्टोनेहम थके कदमों से पैदल वापस लौटने लगती है रास्ते में उसकी पोटली को, जिसमें उसने अपना केक पैक कर रखा है, एक आवारा कुत्ता सूंघता है और उसके साथ-साथ चलने लगता है. 
इस फिल्म के लिए अपर्णा सेन को सर्वश्रेष्ठ निदेशक का राष्ट्रीय पुरस्कार मिला था. अचरज की बात यह है कि जेनीफर को अभिनय के लिए यह पुरस्कार नहीं मिला. फिल्म 1981 में रिलीज़ हुई थी जब उनकी उम्र पचास साल की भी नहीं रही होगी. मगर उनको परदे पर देखकर कौन विश्वास करेगा? चलने का, सीढियां चढ़ने का, हँसते हुए मुंह पर हाथ रख लेने का अंदाज़, सब कुछ एक बीते ज़माने की भद्र महिला का स्मरण करा देता है. फिल्म का निर्माण जेनिफर के पति शशि कपूर ने किया है. यह एक अबूझ पहेली है कि अभिनेता के रूप में लगभग हमेशा एक लापरवाह किस्म की अल्हड़ता झलकाने वाले शशि कपूर एक फिल्म-निर्माता के रूप में इतने संजीदा कैसे हो जाते थे. खैर.....लिखने का मकसद फिल्म के विश्लेषण से ज़्यादा उन लोगों को, जिन्होंने देखी नहीं है, देखने के लिए प्रेरित करना है. यदि ऐसा हुआ तो प्रयास सार्थक होगा. 
पुनश्च: कुछेक को आपत्ति हो सकती है इस आलेख के शीर्षक को लेकर. "मासूम बुढापा" और "शातिर जवानी"! यह कैसे संभव है? राष्ट्रकवि दिनकर ने भी कहा है "कुरुक्षेत्र" में :
यह कौन रोता है वहां 
इतिहास के अध्याय पर, 
जिसमें लिखा है, नौजवानों के लहू का मोल है,
प्रत्यय किसी बूढ़े, कुटिल नीतिज्ञ के व्यवहार का 
जिसका ह्रदय उतना मलिन जितना कि शीर्ष वलक्ष है 
जो आप तो लड़ता नहीं 
कटवा किशोरों को मगर......आदि, आदि.
हमारी राय है कि मासूमियत और शातिरपना दोनों किसी व्यक्ति-विशेष में, उम्र के हर मोड़ पर पाए जा सकते हैं. मगर आर्थिक स्थिति की ही तरह उम्र भी व्यक्ति के व्यवहार को काफी हद तक संचालित करती है. अतएव एक मासूम फितरत वाले बूढ़े का व्यवहार एक काइयां किस्म के धवलकेशी से भिन्न होगा. इसी प्रकार से, छल-कपट से दूर ऊर्जा से भरपूर युवा का आचरण वैसा नहीं होगा जैसा कि एक अवसरवादी नौजवान का होगा. इत्तेफाकन, इस फिल्म में स्टोनेहम एक ऐसे चरित्र के रूप में सामने आती है जिसकी निश्छलता उम्र बीतने और ज़िंदगी के कडवे तजुर्बों के बावजूद बरकरार है. वह एंग्लो-इन्डियन यानी आधी अँगरेज़ हैं मगर उनका भोला मन उनको "बेहतर भविष्य" की तलाश में पश्चिम की और जाने की इजाज़त नहीं देता. उनकी सिधाई उनको नंदिता और समरेश के इरादे भांपने नहीं देती. एक दिन जब वह सब कुछ अपनी आँखों से देख लेती हैं तो स्तब्ध होती हैं मगर कुछ कह नहीं पाती. यह संकोची स्वभाव उन्हें अपने स्कूल की प्रिंसिपल की दादागिरी को चुपचाप सहन करने को विवश कर देता है और फिल्म के आख़िरी दृश्य में छले जाने की तीव्र वेदना के बावजूद बिना तमाशा किये नंदिता और समरेश के घर से लौट जाने को विवश कर देता है. दूसरी तरफ नौजवान नंदिता और समरेश किस प्रकार के लोग हैं? नंदिता एक शातिर लडकी है जिसकी चालाकी शिष्टता की चाशनी में डूबी हुई है. उसका ज़मीर मरा हुआ नहीं दिखता मगर उसको एक आज्ञाकारी बच्चे की तरह चुटकियों में गहरी नींद सुला देने का हुनर वह जानती है. और समरेश? उसको देखकर प्राचीन सूत्रवाक्य याद आता है - निर्लज्जम सदा सुखी. वह खुद तो सुखी रहता ही, कभी-कभी अपने भीतर के मनुष्य के जागने पर दुखी हो जाने वाली नंदिता को भी यह कहकर पटा लेता है कि हम लोग क्या उस बुढिया को (उसी के घर में) कंपनी देकर उस पर कम बड़ा उपकार कर रहे हैं.
बहरहाल, यह सारी व्याख्या केवल सन्दर्भ समझाने के लिए है. जैसा कि पहले कह चुके हैं मासूमियत और शातिरपना, दोनों चीज़ें जवान और बूढ़े में समान रूप से पायी जा सकती हैं. फिल्म बनाने वालों ने अपनी बात कहने के लिए एक मासूम बूढ़े और दो चालाक नौजवानों को चुना और अपनी बात कहने में वे सफल भी हुए.
          मौक़ा निकालकर अवश्य देखें. जिन्होंने देखी है वे भी दोबारा देख सकते हैं.

Thursday, April 7, 2011

A Case for Rohinton Mistry


The life and the literary career of Rohinton Mistry make a fascinating reading. Let’s begin with his literary accomplishments, first. The author has so far penned three novels – Such a Long Journey, A Fine Balance and Family Matters. All his works have been appreciated for their literary worth, making it to the Booker Shortlist. But, Mistry seems to have never been lucky enough to bag the prize. Now, he has once again been shortlisted, alongside 12 others, for the biennial Booker International Prize which is awarded to an author for his entire body of work and not for any particular piece of fiction.
If Mistry goes on to win this one, which is indeed my fervent wish, it would be a befitting tribute to his invaluable contribution to Indian writing in English. He has so far been able to impress with all his three novels, unlike many one-book wonders who have been recipients of the annual Booker prize.
Mistry is one of those writers who like to keep their prose understated. Though possessing a vigorous style, he keeps his flourish inconspicuous so that the reader does not miss out on the richness of the content while marveling at the felicity of the writing.
A major strength of Mistry’s writing is that it places things before the reader in a non-judgmental, but not amoral, fashion. The non-judgmental tone appears to be borne out of Mistry’s reluctance to indulge in any sort of propaganda. And this reluctance seems to be a product of his very deep and compassionate view of human existence, suffering and struggle for dignity. Through his writing, Mistry beckons his readers to take a deep plunge in the ocean of life and come up with jewels of their choice.
In the jargon used by management executives, one often comes across the term “interpersonal skills”, which albeit takes a contrived view of relationships between people. However, Mistry, while primarily concerned with interpersonal matters, takes a holistic view of relationships. He puts it most succinctly in the following passage:
“Curious, he thought, how, if you know a person long enough, he could elicit every kind of emotion from you, every possible reaction, envy, admiration, pity, irritation, fury, fondness, jealousy, love, disgust. But in the end all human beings became candidates for compassion, all of us, without exception…..”(Family Matters, page 358).
There are two things for which Mistry shows a concern in all the three novels he has written so far. These are the Parsi community and the city of Bombay/Mumbai. This seems quite natural as Mistry himself is a Zoroastrian who has spent his formative years in the cosmopolitan city. No wonder, in all the three novels most of the major characters are Parsis and much of the drama takes place in India’s commercial capital. However, Mistry deftly weaves his fiction in a manner that it becomes hard for a reader like me, a non-Parsi who is not well-acquainted with Mumbai, to feel that one is operating in an unfamiliar milieu. This might be, to some extent, because of the fact that Mistry imbues each and every character of his novels with enough flesh and blood. In addition, without sounding polemical, Mistry makes no bones about his outrage at the alleged sleights of hand of Indira Gandhi on her way to achieving cult status(Such A Long Journey), the tales of horror associated with the excesses committed during the Emergency (A Fine Balance) and the Shiv Sena’s over-zealous Marathi politics, especially against the backdrop of its forays into mainstream politics in the late 1990s (Family Matters).
No wonder, despite his understated and sober prose, Mistry found himself in the midst of a controversy recently when sudden discovery of profanities by a scion of a powerful family saw his debut novel being withdrawn from the curriculum of the Mumbai University. If, however, politicians took the trouble to read his works, they would certainly be left scratching their heads and wondering as to whose side Mistry was taking. Not surprising, especially when politics has become a trade meant only for the street-smart and the semi-literate.
However, this is all the more reason for me to support, and seek support from friends, for Mistry. And the best way to support Mistry is to read his works. It is not going to be a bad bargain, I can guarantee. Anyone who takes the trouble will end up gaining a handsome amount of intellectual and emotional wealth.
Those who might be curious to know more about the man, I have this small bit of information which they may find quite exciting, nevertheless. Mistry was born in Mumbai in 1952 and he began his career as a bank employee after doing his MA in Economics and Mathematics (!!!) from Mumbai University. It was at the University that he met his wife to be, Freny, to whom he has  dedicated all his books so far. Interestingly, it was Freny, who was pursuing English Literature and after her post-graduation, decided to emigrate to Canada for further studies. Mistry followed suit, leaving his bank job, where the two got married and Freny took up a teaching job. Mistry, in the meanwhile, got employed at a Canadian bank and also enrolled for a bachelor’s degree in English and Philosophy at the University of Toronto. In the process, he began to discover his own passion for writing, something he had been hitherto unaware of. His first book was a short-story collection Tales From Firozsha Baag (unavailable to me, hence my inability to comment on it). The rest, as they say, is history